इस प्रकार करेंगे जौ की खेती तो होगा बड़ा मुनाफा, इन बातों का रखें ख्याल

जौ की खेती: किस्में, भूमि तैयारी, बुवाई व सिंचाई की संपूर्ण जानकारी 


जौ की खेती करने के वैज्ञानिक तरीके up to date


जौ की खेती (Barley Farming)  भारत के प्रमुख रबी फसलों में से एक है, जो कम पानी, कम लागत और प्रतिकूल वातावरण में भी अच्छी पैदावार देने के लिए प्रसिद्ध है। इसकी खेती के लिए उपजाऊ दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम मानी जाती है। जौ की उन्नत किस्मों जैसे आरडी 2035, आरडी 2552, ज्योति और डीडब्ल्यू-28 का चयन उत्पादन को बढ़ाता है। खेत की अच्छी तरह जुताई, संतुलित खाद प्रबंधन और समय पर सिंचाई से जौ की फसल मजबूत होती है। कम लागत में अधिक लाभ देने वाली यह फसल पशु चारा, माल्ट, बीयर उद्योग और दलिया बनाने जैसी कई जरूरतों को पूरा करती है, इसलिए किसान इसकी खेती को उपजाऊ तथा कम लागत वाली फसल के रूप में व्यापक रूप से अपनाते हैं। पशु चारा, दलिया, बीयर उद्योग और कई खाद्य उत्पादों में जौ का उपयोग होने से इसकी मांग लगातार बनी रहती है। इसकी खेती देश के लगभग सभी राज्यों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। जौ की खेती ठंडी और शुष्क जलवायु में सबसे अच्छी होती है। 15-25 डिग्री सेल्सियस Temperature  तापमान इसके लिए आदर्श है। यह फसल हल्की दोमट से लेकर मध्यम काली मिट्टी तक सभी प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है, लेकिन अच्छी जलनिकासी वाली दोमट भूमि सबसे उत्तम मानी जाती है। मिट्टी का पीएच 6.5 से 7.5 होना बेहतर होता है। Barley Cultivation Information Guide 

जौ की खेती करने के वैज्ञानिक तरीके up to date



भूमि की तैयारी

खेत को पहले एक गहरी जुताई कर के भुरभुरी मिट्टी तैयार करें। उसके बाद 2झ्र3 हैरो या कल्टीवेटर चलाकर खेत को समतल और खरपतवार रहित बनाएं। अंतिम जुताई के समय 8-10 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिलाएं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों की वृद्धि बेहतर होती है।

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प्रमुख किस्में

जौ की कई उन्नत किस्में किसानों में लोकप्रिय हैं जैसे—

  •  RD 2035, 
  • RD 2552,
  •  DWRB 92, 
  • DWR 28 और RD 2660 

आरडी-2035: अधिक उत्पादन देने वाली और बीमारियों के प्रति सहनशील।

आरडी-2052: शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त।

बीएच-946: दाने बड़े, फसल मजबूत और समय पर पकने वाली।

के-508 और ज्योति अच्छी गुणवत्ता व उच्च उपज वाली प्रजातियाँ।

किस्म का चयन स्थानीय जलवायु व मिट्टी को ध्यान में रखकर करें।

बीज व बुवाई

प्रति हेक्टेयर 80-100 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। बीज को बुवाई से पहले 2झ्र3 ग्राम कार्बेन्डाजिम या थिरम प्रति किलोग्राम से उपचारित करें, इससे बीजजनित रोगों से सुरक्षा मिलती है। जौ की बुवाई आमतौर पर अक्तूबर के मध्य से नवंबर के अंत तक की जाती है। कतार से कतार की दूरी 22-25 सेमी रखनी चाहिए।

खाद व उर्वरक


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खेत में 40-50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 

20-25 किलोग्राम फॉस्फोरस और 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। आधी नाइट्रोजन और अन्य उर्वरक बुवाई के समय दें तथा शेष नाइट्रोजन पहली सिंचाई के बाद।

10-20 गाड़ी सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर डालें

सिंचित स्थिति में, नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा को प्रथम सिंचाई के बाद या बुवाई के 30 दिन बाद प्रयोग करना चाहिए। हल्की मिट्टी के मामले में, नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा तथा फास्फोरस की पूरी मात्रा, नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा को प्रथम सिंचाई के बाद तथा शेष एक तिहाई मात्रा को द्वितीय सिंचाई के बाद प्रयोग करना चाहिए। up to date


सिंचाई प्रबंधन

जौ को बहुत अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती। बुवाई के बाद पहली सिंचाई 25-30 दिन पर करें। दाना बनने की अवस्था पर दूसरी सिंचाई अत्यंत आवश्यक होती है। अधिक पानी देने से पौधा गिरने (लॉजिंग) व रोग बढ़ने की संभावना रहती है। बुवाई के 120-130 दिन बाद फसल पकने लगती है। जब दाने सख्त हो जाएं और पौधे का रंग सुनहरा हो जाए, तब कटाई करें। अच्छी देखभाल पर 40-50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। up to date

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