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| राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल up to date |
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के सबसे मजबूत स्तंभ माने जाने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह कोई सैन्य अभियान या कूटनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि उनका संचार से जुड़ा निजी और पेशेवर तरीका है। हाल ही में आयोजित ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ कार्यक्रम में डोभाल ने खुद स्वीकार किया कि वे आमतौर पर फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते और इसके बजाय ऐसे वैकल्पिक संचार माध्यमों पर निर्भर रहते हैं, जिनके बारे में आम लोग जानते तक नहीं हैं। up to date
युवाओं से संवाद में किया खुलासा
‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ के दौरान जब युवाओं ने उनसे सवाल पूछे, तो एक सवाल उनके निजी जीवन और कामकाज की शैली से जुड़ा था। इसी सवाल के जवाब में अजीत डोभाल ने बेहद सहज लेकिन गंभीर अंदाज में कहा,
“मुझे नहीं पता आपको कैसे पता चला कि मैं फोन का इस्तेमाल नहीं करता, लेकिन यह सच है कि मैं इंटरनेट का उपयोग नहीं करता।” up to date
उनका यह बयान सुनकर कार्यक्रम में मौजूद युवा हैरान रह गए, क्योंकि आज के डिजिटल युग में जहां हर काम मोबाइल और इंटरनेट से जुड़ा है, वहां देश की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाला व्यक्ति इनसे दूरी बनाए रखता है।
फोन का सीमित उपयोग, वह भी मजबूरी में
डोभाल ने आगे स्पष्ट किया कि वे फोन का उपयोग पूरी तरह से बंद नहीं करते, लेकिन यह उपयोग बहुत सीमित होता है।
उन्होंने कहा,
“फोन का इस्तेमाल केवल पारिवारिक या बहुत निजी बातचीत के लिए करता हूं। कभी-कभी काम के लिए थोड़ा बहुत करना पड़ता है, लेकिन कोशिश रहती है कि इसका उपयोग न्यूनतम हो।”
उनका यह बयान यह दर्शाता है कि वे निजी और पेशेवर जीवन में डिजिटल अनुशासन को कितना महत्व देते हैं।
इंटरनेट से दूरी क्यों?
जब उनसे इंटरनेट के उपयोग को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वे इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते। इसके पीछे कारण सीधे तौर पर नहीं बताया गया, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण साइबर सुरक्षा और गोपनीयता है। up to date
आज के समय में साइबर जासूसी, डेटा लीक और हैकिंग जैसी घटनाएं आम हो चुकी हैं। ऐसे में देश की सुरक्षा से जुड़े शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति का इंटरनेट से दूरी बनाकर रखना एक सुरक्षात्मक रणनीति भी मानी जा सकती है।
गुप्त और वैकल्पिक संचार माध्यम
अजीत डोभाल ने यह भी बताया कि संचार के केवल वही साधन नहीं होते, जिनके बारे में आम लोग जानते हैं।
उन्होंने कहा,
“संचार के कई साधन होते हैं। कई ऐसे माध्यम भी होते हैं, जिनके बारे में आम लोगों को जानकारी नहीं होती। कई बार ऐसे साधन जुटाने पड़ते हैं, जो सार्वजनिक जानकारी में नहीं होते।”
उनके इस बयान से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवाद के लिए अत्यंत गोपनीय और सुरक्षित माध्यमों का उपयोग किया जाता है, ताकि किसी भी तरह की जानकारी लीक न हो।
विदेशों से संवाद भी बिना इंटरनेट
डोभाल ने यह भी स्वीकार किया कि उन्हें विदेशों में मौजूद कई लोगों और अधिकारियों से बातचीत करनी पड़ती है। up to date
उन्होंने कहा,
“मुझे बहुत बाहर के देशों से बात करनी पड़ती है। वह तो होता ही है। काम चल जाता है।”
इस बयान से यह साफ होता है कि अंतरराष्ट्रीय संवाद के लिए भी वे परंपरागत डिजिटल माध्यमों से अलग रास्ते अपनाते हैं, जो सुरक्षा की दृष्टि से अधिक मजबूत माने जाते हैं।
सूफी विद्वानों का प्रतिनिधिमंडल पहुंचा एनएसए से मिलने
इसी बीच, आईएएनएस के अनुसार, रविवार को सूफी विद्वानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने अजीत डोभाल से मुलाकात की। इस मुलाकात का उद्देश्य भाईचारे, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक सद्भाव को मजबूत करना था।
प्रतिनिधिमंडल ने सूफी संस्कृति को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने और कट्टरपंथ के खिलाफ मिलकर संघर्ष करने की अपनी योजनाएं साझा कीं।
‘मेरा मुल्क, मेरी पहचान’ मिशन की सराहना
ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल (AISSC) के अध्यक्ष हजरत सैयद नासिरुद्दीन चिश्ती ने बताया कि अजीत डोभाल ने उनके ‘मेरा मुल्क, मेरी पहचान’ मिशन की खुलकर सराहना की।
उन्होंने कहा कि यह अभियान देश में आपसी भाईचारे को मजबूत करने और धर्म के नाम पर फैलने वाली नफरत को खत्म करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
भारत की सभ्यतागत पहचान पर जोर
हजरत नासिरुद्दीन चिश्ती ने कहा, हजरत नासिरुद्दीन चिश्ती ने कहा कि इस अभियान का अहम उद्देश्य यह है कि हमारा देश सभी धर्मों और विश्वासों के होते हुए एक साझा सांस्कृतिक और सभ्यात्मक पहचान रखता है।
उन्होंने आगे कहा, “हमारा देश वैश्विक पहचान का केंद्र है। दुनिया में हम कहीं भी जाते हैं, तो हमें हिंदू या मुस्लिम नहीं, बल्कि भारतीय कहा जाता है।”
राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा का साझा संदेश
सूफी विद्वानों और एनएसए डोभाल की यह मुलाकात केवल औपचारिक नहीं थी, बल्कि इसमें राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव और आंतरिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर गहन चर्चा हुई।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की सुरक्षा केवल सीमा पर तैनात सेना से नहीं, बल्कि समाज के भीतर मौजूद एकता और भाईचारे से भी जुड़ी हुई है। ऐसे में सूफी संतों और विद्वानों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।
डोभाल की कार्यशैली फिर चर्चा में
अजीत डोभाल पहले भी अपनी सख्त, गोपनीय और रणनीतिक कार्यशैली को लेकर चर्चा में रहे हैं। चाहे आतंकवाद के खिलाफ अभियान हों या अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, उनकी रणनीतियों में गोपनीयता और अनुशासन हमेशा प्राथमिकता रही है। up to date
फोन और इंटरनेट से दूरी बनाकर रखना भी उसी सोच का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाता।
डिजिटल युग में राष्ट्रीय सुरक्षा---
‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ में दिया गया अजीत डोभाल का बयान केवल एक व्यक्तिगत आदत का खुलासा नहीं है, बल्कि यह आज के डिजिटल युग में राष्ट्रीय सुरक्षा की गंभीर चुनौतियों की ओर भी इशारा करता है। वहीं, सूफी विद्वानों के साथ उनकी मुलाकात यह संदेश देती है कि मजबूत भारत की नींव केवल तकनीक और ताकत नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, भाईचारे और सांस्कृतिक एकता पर भी टिकी है। up to date

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