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| बिठमड़ा निवासी तारा भांजा ने प्रेरणादायक मिसाल पेश की है |
हिसार। दहेज प्रथा के खिलाफ आज भी जब समाज में ठोस उदाहरणों की जरूरत है, तब हिसार जिले के गांव बिठमड़ा निवासी तारा भांजा ने अपने आचरण से एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की है। तारा भांजा के बेटे राममेहर की शादी 21 दिसंबर को गांव धमतान की अंजू से संपन्न हुई। इस विवाह की सबसे खास बात यह रही कि इसमें एक पैसा भी दहेज नहीं लिया गया। तारा भांजा ने स्पष्ट शब्दों में वधू पक्ष से मिलने वाले 10 लाख रुपये नकद, 20 तोले सोना, गाड़ी और दहेज में दिए जाने वाले अन्य सभी सामान लेने से साफ इनकार कर दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी होने वाली बहू के लिए गहने अपने घर से बनवाकर दिए। उनका मानना है कि दुल्हन ही सबसे बड़ा दहेज होती है और शादी को लेन-देन का सौदा नहीं बनाया जाना चाहिए। तारा भांजा ने कहा कि वे दहेज लेने और देने—दोनों के सख्त खिलाफ हैं।
जीवन भर अपनाया यही सिद्धांत
उन्होंने एक पुराना अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब वे अपनी बेटी के लिए रिश्ता देखने दहमान गांव गए थे, तब लड़के पक्ष ने यह कहकर दहेज का संकेत दिया कि उनके पड़ोस में हुई शादी में गाड़ी दी गई थी। इस पर तारा भांजा ने साफ कह दिया कि वे दहेज लोभियों से रिश्ता नहीं करेंगे। उन्होंने उसी समय निर्णय ले लिया था कि जब वे अपनी बेटी की शादी बिना दहेज करेंगे, तो अपने बेटे की शादी में दहेज लेने का सवाल ही नहीं उठता। बुजुर्ग तारा भांजा ने यह भी बताया कि उनकी दो शादियां हुई हैं और उन्होंने अपने समय में भी बिना दहेज विवाह किया था। उनके लिए यह कोई नई सोच नहीं, बल्कि जीवनभर अपनाया गया सिद्धांत है। वे कहते हैं कि समाज को सही दिशा में ले जाने के लिए केवल बातें नहीं, बल्कि व्यवहार में बदलाव जरूरी है।
नानी के पास रहे तारा तो बने ‘ तारा भांजा’
तारा भांजा के नाम के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। उनका असली नाम तारा है। बचपन में वे ढाई साल की उम्र से अपनी नानी के पास रहने लगे थे, इसी कारण पूरे गांव में उन्हें प्यार से भांजा कहा जाने लगा और वे तारा भांजा के नाम से मशहूर हो गए। आज भी गांव में उनकी पहचान उनके सिद्धांतों और साफ सोच के लिए है। गांव बिठमड़ा में तारा भांजा और उनके परिवार की इस पहल की चारों ओर सराहना हो रही है। लोग मानते हैं कि ऐसे उदाहरण ही समाज में फैली दहेज जैसी बीमारी को खत्म करने में मदद कर सकते हैं। आज के समय में जहां कई लोग खुलेआम दहेज की मांग करते हैं, वहीं तारा भांजा जैसे लोग समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनकर सामने आते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर हर परिवार तारा भांजा जैसी सोच अपनाए, तो बेटियों के माता-पिता पर दहेज का बोझ कभी न पड़े। ऐसे परिवार सचमुच सलाम के हकदार हैं, जो सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मजबूती से खड़े होते हैं।


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