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| चने की बिजाई का रकबा बीते कई दशकों से घट रहा है। up to date |
सिरसा जिले में चने की खेती लगातार सिमटती जा रही है। सरकार और कृषि विभाग की ओर से किए जा रहे तमाम प्रयासों के बावजूद चनों की बिजाई का रकबा बीते कई दशकों से घट रहा है। हालांकि वर्ष 2025-26 में किसानों के लिए थोड़ी राहत की खबर सामने आई है। इस बार जिले में लगभग 3000 हेक्टेयर में चने की फसल की बिजाई हुई है, जो पिछले साल 2024-25 के 2400 हेक्टेयर के मुकाबले करीब 600 हेक्टेयर अधिक है। बावजूद इसके, लंबे समय के आंकड़ों को देखें तो चने की खेती में आई यह गिरावट किसानों और कृषि विशेषज्ञों दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। up to date
दशकों में सिमटता गया चने का रकबा
कृषि विभाग के उपलब्ध आंकड़ों पर नजर डालें तो सिरसा जिला कभी चने की खेती के लिए जाना जाता था। वर्ष 1975-76 में जिले में लगभग 1 लाख 47 हजार हेक्टेयर में चने की बिजाई की गई थी और उस समय उत्पादन करीब 1 लाख 33 हजार मीट्रिक टन तक पहुंच गया था। इसके बाद 1979 में चने की बिजाई का रकबा बढ़कर 1 लाख 66 हजार हेक्टेयर तक पहुंचा, लेकिन यह वृद्धि ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सकी। साल 1980 के बाद से चनों के रकबे में लगातार गिरावट दर्ज की जाने लगी। वर्ष 1990 में चने की बिजाई घटकर 97 हजार हेक्टेयर रह गई, वहीं 1995 में यह आंकड़ा 56 हजार हेक्टेयर तक सिमट गया। साल 2000 में हालात और खराब हुए, जब जिले में मात्र 13 हजार हेक्टेयर में ही चने की बिजाई हो पाई और उत्पादन घटकर करीब 8 हजार मीट्रिक टन रह गया।
इसके बाद भी गिरावट का सिलसिला थमता नजर नहीं आया। वर्ष 2010 में चने की फसल 8 हजार हेक्टेयर में बोई गई और उत्पादन लगभग 6 हजार मीट्रिक टन रहा। साल 2014 में तो स्थिति और भी चिंताजनक हो गई, जब जिले में चने की बिजाई का रकबा घटकर मात्र 5 हजार हेक्टेयर रह गया। up to date
कुछ सालों में हल्की बढ़त, फिर गिरावट
वर्ष 2016 में चने की बिजाई का क्षेत्रफल बढ़कर करीब 8 हजार हेक्टेयर तक पहुंचा था और 2017 में यह आंकड़ा 9450 हेक्टेयर तक चला गया। इससे किसानों और विभाग को थोड़ी उम्मीद जगी थी कि शायद चने की खेती फिर से रफ्तार पकड़ेगी। लेकिन यह उम्मीद ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी। up to date
साल 2018-19 में चने की बिजाई घटकर 6800 हेक्टेयर रह गई, जबकि 2019-20 में यह और कम होकर केवल 4400 हेक्टेयर तक सिमट गई। इसके बाद 2021-22 में चने की फसल मात्र 3315 हेक्टेयर में ही बोई गई। वर्ष 2024-25 में यह रकबा और घटकर 2400 हेक्टेयर रह गया था, जो जिले के कृषि इतिहास में बेहद कम माना जाता है।
2025-26 में बढ़ा रकबा, बनी उम्मीद
वर्ष 2025-26 में जिले में चने की बिजाई बढ़कर 3000 हेक्टेयर तक पहुंच गई है। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से मानसून की अच्छी बारिश के कारण मानी जा रही है। किसानों का कहना है कि इस बार बरसात समय पर और अच्छी मात्रा में हुई, जिससे बरानी जमीनों में चने की बिजाई के लिए नमी उपलब्ध हो सकी। यही कारण है कि पिछले साल की तुलना में लगभग 600 हेक्टेयर अधिक क्षेत्र में चने की फसल बोई जा सकी। up to date
हालांकि यह बढ़ोतरी कुल मिलाकर बहुत बड़ी नहीं मानी जा सकती, लेकिन लगातार गिरावट के बीच इसे सकारात्मक संकेत के रूप में जरूर देखा जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले वर्षों में भी बारिश अनुकूल रही और किसानों को उचित भाव मिले, तो चने की खेती में कुछ हद तक सुधार संभव है।
खारा पानी बना सबसे बड़ी बाधा
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सिरसा जिले में चने की खेती घटने का सबसे बड़ा कारण भूमिगत जल का खारा होना है। चने की फसल के लिए मीठा जल या बारिश का पानी ही उपयुक्त माना जाता है। जिले के अधिकांश हिस्सों में ट्यूबवेल का पानी खारा है, जो चने की फसल को नुकसान पहुंचाता है। इसके चलते चनों का उत्पादन कम हो जाता है और किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। यही वजह है कि किसानों का रुझान धीरे-धीरे चने की बजाय गेहूं और सरसों जैसी फसलों की ओर बढ़ गया है, जिन्हें खारे पानी से भी किसी हद तक उगाया जा सकता है। up to date
किसानों की मजबूरी और बदलता रुझान
जिले के किसान जगदीश, राजकुमार, महेंद्र सिंह और रामकुमार का कहना है कि गेहूं और सरसों की बिजाई आमतौर पर नहरी जमीन में की जाती है, जबकि चनों की खेती अधिकतर बरानी जमीन पर निर्भर रहती है। चने की फसल में कम सिंचाई की जरूरत होती है, लेकिन इसके लिए मानसून की अच्छी बारिश बेहद जरूरी है।
किसानों का कहना है कि सिरसा जिले में नहरी पानी की भारी कमी है और भूमिगत जल खारा होने के कारण चनों की खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर हो गई है। ऐसे में यदि बारिश कमजोर पड़ जाए, तो चने की फसल को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। up to date
इसके अलावा चने के भाव भी बीते कई वर्षों से खास आकर्षक नहीं रहे हैं। किसानों के अनुसार जब बाजार में चने के दाम कम मिलते हैं, तो जोखिम उठाकर इस फसल को बोने का कोई खास फायदा नजर नहीं आता। इसके उलट सरसों के भाव हाल के वर्षों में अच्छे रहे हैं, जिसके चलते किसानों ने सरसों की बिजाई ज्यादा करना शुरू कर दिया है। up to date
कृषि विभाग के प्रयास
कृषि विभाग ने चने की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास किए हैं। विभाग की ओर से गांव-गांव जाकर विशेष मुहिम चलाई गई, प्रदर्शन प्लॉट लगाए गए और किसानों को आधुनिक तकनीकों की ट्रेनिंग भी दी गई। इसका उद्देश्य यह था कि कम पानी में बेहतर उत्पादन लेकर किसानों को चने की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
हालांकि इन प्रयासों का सीमित असर ही देखने को मिला है। विभाग के अधिकारियों का मानना है कि जब तक सिंचाई की समस्या और बाजार भाव की अनिश्चितता दूर नहीं होती, तब तक चने की खेती को बड़े स्तर पर बढ़ाना मुश्किल रहेगा। up to date
कृषि उपनिदेशक का बयान
कृषि जिला उपनिदेशक डॉ. सुखदेव सिंह ने बताया कि वर्ष 2025-26 में जिले में करीब 3000 हेक्टेयर में चने की बिजाई हुई है। उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों से चने की बिजाई और उत्पादन दोनों में गिरावट आ रही थी और किसानों का रुझान भी कम हो गया था। लेकिन इस बार मानसून की अच्छी बारिश के चलते पिछले साल के मुकाबले लगभग 600 हेक्टेयर अधिक क्षेत्र में चने की फसल बोई गई है।
डॉ. सुखदेव सिंह के अनुसार चने की फसल के लिए बारिश का पानी या मीठा जल ही सबसे उपयुक्त होता है, जबकि जिले का अधिकतर भूमिगत जल इसके लिए अनुकूल नहीं है। पहले बरानी जमीनों में चने की खेती बड़े पैमाने पर होती थी, लेकिन अब बरानी जमीन भी लगातार कम होती जा रही है। विभाग ने पहले भी प्रदर्शन प्लॉट और विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से चने की बिजाई बढ़ाने के प्रयास किए थे और आगे भी ऐसे प्रयास जारी रहेंगे।
भविष्य की राह
कुल मिलाकर सिरसा जिले में चने की खेती आज एक कठिन दौर से गुजर रही है। इस बार रकबे में हुई मामूली बढ़ोतरी जरूर उम्मीद जगाती है, लेकिन स्थायी सुधार के लिए सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, मीठे पानी की उपलब्धता और चने के उचित समर्थन मूल्य जैसे मुद्दों पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। यदि इन समस्याओं का समाधान किया जाए, तो आने वाले समय में चना फिर से सिरसा जिले की प्रमुख फसलों में अपनी जगह बना सकता है। up to date

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