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| चमत्कारों से भरी कथा है भीम के पौत्र बर्बरीक की up to date |
महाभारत काल की अनेक कथाएँ आज भी भारतीय जनमानस में आस्था, भक्ति और रहस्य के रूप में जीवित हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत विलक्षण, भावनात्मक और चमत्कारों से भरी कथा है भीम के पौत्र बर्बरीक की, जिन्हें आज संपूर्ण भारत खाटू श्याम बाबा के नाम से पूजता है। यह केवल एक योद्धा की कहानी नहीं, बल्कि त्याग, धर्म और ईश्वर-भक्ति की ऐसी मिसाल है जिसने कलियुग में भी करोड़ों श्रद्धालुओं को आस्था का सहारा दिया है। up to date
बर्बरीक: अपराजेय धनुर्धर का जन्म
बर्बरीक का जन्म महाबली भीम के पुत्र घटोत्कच और नागकन्या मौरवी के पुत्र के रूप में हुआ। जन्म से ही बर्बरीक में असाधारण शक्ति और दिव्य प्रतिभा विद्यमान थी। बाल्यकाल में ही उन्होंने घोर तपस्या द्वारा देवी की आराधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें तीन दिव्य बाण प्रदान किए।
इन तीन बाणों की विशेषता यह थी कि पहला बाण शत्रुओं को चिन्हित करता, दूसरा बाण उनका संहार करता और तीसरा बाण बचे हुए बाणों को पुनः बर्बरीक के तरकश में वापस ले आता। इसी कारण बर्बरीक को अजेय माना जाता था। कहा जाता है कि वे अपने पिता घटोत्कच से भी अधिक शक्तिशाली और मायावी थे। up to date
महाभारत युद्ध और बर्बरीक की प्रतिज्ञा
जब महाभारत का युद्ध प्रारंभ होने वाला था, तब बर्बरीक भी युद्धभूमि की ओर चल पड़े। लेकिन उन्होंने एक अनोखी प्रतिज्ञा कर रखी थी—
“मैं युद्ध में उस पक्ष की ओर से लड़ूंगा, जो हार रहा होगा।”
युद्धभूमि में वे दोनों सेनाओं के मध्य एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए और अपनी प्रतिज्ञा की घोषणा कर दी। यह सुनकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण चिंतित हो उठे। कृष्ण यह भली-भांति जानते थे कि यदि बर्बरीक युद्ध में उतरे, तो वे अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार दोनों पक्षों की सेनाओं का संहार कर सकते हैं और धर्म की विजय का संतुलन बिगड़ जाएगा। up to date
बर्बरीक की वीरता की परीक्षा
बर्बरीक की शक्ति को परखने के लिए श्रीकृष्ण और अर्जुन उनके समक्ष उपस्थित हुए। श्रीकृष्ण ने कहा—
“यदि तुम इस पीपल के वृक्ष के सभी पत्तों को एक ही तीर से भेद सको, तो मैं तुम्हारी वीरता स्वीकार कर लूंगा।”
बर्बरीक ने आज्ञा लेकर बाण चलाया। बाण एक-एक कर सभी पत्तों को भेदता चला गया। इसी बीच एक पत्ता टूटकर नीचे गिर पड़ा। श्रीकृष्ण ने उसे बचाने के विचार से अपने पैर के नीचे दबा लिया। लेकिन वह बाण सभी पत्तों को भेदता हुआ श्रीकृष्ण के चरणों के पास आकर रुक गया। up to date
तब बर्बरीक ने विनम्रता से कहा—
“प्रभु, आपके पैर के नीचे एक पत्ता दबा है। कृपया पैर हटा लीजिए। मैंने बाण को केवल पत्तों को भेदने की आज्ञा दी है, आपके चरणों को नहीं।”
यह देखकर श्रीकृष्ण समझ गए कि यह योद्धा यदि युद्ध में उतरा, तो महाभारत का परिणाम अनिश्चित हो जाएगा।
ब्राह्मण वेश और शीशदान
धर्म की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने एक कठोर किंतु आवश्यक निर्णय लिया। वे ब्राह्मण का वेश धारण कर प्रातः बर्बरीक के शिविर पहुंचे और दान मांगने लगे। up to date
बर्बरीक ने कहा—
“ब्राह्मण देव, जो मांगोगे, दूंगा।”
कृष्ण ने उत्तर दिया—
“तुम दे न सकोगे।”
दानवीर बर्बरीक ने हँसकर कहा—
“ऐसा कोई दान नहीं जो मैं न दे सकूं।”
तब ब्राह्मणरूपी कृष्ण ने उससे उसका शीश मांग लिया। क्षण भर के लिए वातावरण स्तब्ध हो गया, किंतु बर्बरीक तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने इसे भगवान की इच्छा मानकर सहर्ष स्वीकार किया।
महाभारत दर्शन और अमर वरदान
शीशदान से पूर्व बर्बरीक ने इच्छा जताई कि वे महाभारत युद्ध का साक्षी बनना चाहते हैं। श्रीकृष्ण ने उनके शीश को एक ऊँचे स्थान पर स्थापित कर दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिससे वे पूरे युद्ध को देख सके। up to date
कहा जाता है कि फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को स्नान-पूजन कर बर्बरीक ने स्वयं अपने हाथ से अपना शीश काटकर श्रीकृष्ण को अर्पित किया। यह त्याग इतिहास में अद्वितीय है।
युद्ध समाप्ति के बाद जब पांडव विजय का श्रेय लेने लगे, तब श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के शीश से निर्णय करवाया। बर्बरीक ने कहा—
“युद्ध में दोनों ओर श्रीकृष्ण का सुदर्शन ही चल रहा था और द्रौपदी महाकाली रूप में रक्तपान कर रही थीं।”
तब श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर बर्बरीक को वरदान दिया—
“कलियुग में तुम मेरे नाम से पूजे जाओगे। तुम्हारा स्मरण मात्र भक्तों का कल्याण करेगा।”
खाटू श्याम: आस्था का केंद्र
जिस स्थान पर श्रीकृष्ण ने बर्बरीक का शीश स्थापित किया, वह स्थान खाटू कहलाया और बर्बरीक खाटू श्याम के रूप में पूजित हुए। up to date
आज खाटू श्याम मंदिर राजस्थान का एक प्रमुख तीर्थ है। मंदिर की वर्तमान आधारशिला सन 1720 में रखी गई थी। इतिहासकार पंडित झाबरमल्ल शर्मा के अनुसार, 1679 में औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को नष्ट किया था, जिसकी रक्षा में अनेक राजपूत वीरों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
अनजाने रहस्य और लोकआस्था
खाटू श्याम को “हारे का सहारा” कहा जाता है। वे निराश और पराजित लोगों को संबल प्रदान करने वाले देवता माने जाते हैं।
फाल्गुन शुक्ल षष्ठी से एकादशी तक लगने वाला खाटू श्याम मेला लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, जिसमें ग्यारस का दिन विशेष महत्व रखता है। up to date
कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी को खाटू श्याम का जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
बर्बरीक की कथा: -
बर्बरीक की कथा केवल वीरता की नहीं, बल्कि त्याग, धर्म और पूर्ण समर्पण की अमर गाथा है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा वीर वही है, जो धर्म की रक्षा के लिए स्वयं का बलिदान दे सके। आज भी जब भक्त खाटू श्याम का नाम लेते हैं, तो उन्हें विश्वास होता है कि हारे हुए को जीत दिलाने वाला, निराश को आशा देने वाला देवता उनके साथ है। यही कारण है कि खाटू श्याम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का प्रतीक हैं।

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