Beneshwar Dham Mahamela 2026: बेणेश्वर धाम का महामेला, पाताल लोक से जुड़ी मान्यताएं और दिव्य नारियल का रहस्य

पवित्र धाम त्रिवेणी संगम के बीच बसे एक प्राचीन टापू पर अवस्थित 

बेणेश्वर… एक नाम, जो आस्था, विश्वास और लोकपरंपराओं की अनगिनत सरिताओं को अपने भीतर समेटे हुए है। राजस्थान के बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों की सीमा पर स्थित यह पवित्र धाम सोम, माही और जाखम नदियों के त्रिवेणी संगम के बीच बसे एक प्राचीन टापू पर अवस्थित है। हर वर्ष माघ पूर्णिमा के अवसर पर यहां लगने वाला बेणेश्वर महामेला वागड़ अंचल का सबसे बड़ा और पवित्र धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सव माना जाता है। up to date

मावजी महाराज की लीलास्थली

बेणेश्वर धाम संत शिरोमणि मावजी महाराज की लीलास्थली के रूप में विख्यात है। वागड़ क्षेत्र का शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा, जिसकी श्रद्धा मावजी महाराज और बेणेश्वर धाम से न जुड़ी हो। लोकमान्यताओं के अनुसार यह स्थल चमत्कारों और दैवी कृपा से परिपूर्ण है। माघ पूर्णिमा के दिन यहां लाखों श्रद्धालु एकत्र होकर संगम स्नान करते हैं और मेले की परंपराओं में सहभागी बनते हैं। up to date

आदिवासी कुंभ का स्वरूप

आदिवासी समाज का “कुंभ”  up to date


बेणेश्वर महामेला केवल एक मेला नहीं, बल्कि आदिवासी समाज का “कुंभ” कहा जाता है। वागड़ अंचल के साथ-साथ गुजरात, मध्यप्रदेश और देश के अन्य हिस्सों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में धर्म, सामाजिक समरसता, लोकसंस्कृति और मनोरंजन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

तकदीर बदलने वाले दिव्य नारियल

बेणेश्वर महामेले की सबसे अनूठी परंपरा है — आबूदर्रा में उछाले जाने वाले नौ दिव्य नारियल। माघ पूर्णिमा के दिन जब बेणेश्वर पीठाधीश्वर संगम में स्नान करते हैं, तब मंत्रोच्चार के साथ पांच नारियल आबूदर्रा और चार नारियल राधाकुंड में उछाले जाते हैं। up to date
लोकमान्यता है कि जिसे यह नारियल प्राप्त हो जाता है, उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यही कारण है कि इन नारियलों को पाने के लिए श्रद्धालुओं में जबरदस्त उत्साह और प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है।

नौ अंक का आध्यात्मिक महत्व

बेणेश्वर की परंपराओं में नौ का अंक विशेष महत्व रखता है। माघ पूर्णिमा की रात भर चलने वाली रासलीला के समापन पर भी रास कलाकारों को नौ नारियल भेंट किए जाते हैं। माव संप्रदाय के भक्त इसे ठाकुरजी और अष्ट सखियों के प्रति समर्पण का प्रतीक मानते हैं। up to date

संगम जल में दिव्य दर्शन की मान्यता

बेणेश्वर संगम में समस्त तीर्थों का वास up to date


लोक आस्था है कि माघ पूर्णिमा के दिन बेणेश्वर संगम में समस्त तीर्थों का वास होता है। इस दिन संगम स्नान करने से पापों का शमन और आरोग्यता की प्राप्ति होती है। मान्यता यह भी है कि पीठाधीश्वर को स्नान के दौरान जल के भीतर दिव्य राजप्रासाद और अलौकिक विभूतियों के दर्शन होते हैं। up to date

राजा बलि की यज्ञस्थली और पाताल लोक का मार्ग

आबूदर्रा को लेकर पौराणिक मान्यता है कि यहीं राजा बलि ने यज्ञ किया था। समीप की पहाड़ियों पर आज भी यज्ञस्थली के अवशेष दिखाई देते हैं। कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने वामन अवतार में राजा बलि से तीन पग भूमि का दान लिया और तीसरे पग से उन्हें पाताल लोक भेजा। तभी से आबूदर्रा को पाताल लोक का मार्ग माना जाता है। up to date

हर जीव के लिए अन्नदान

बेणेश्वर महामेला मानव ही नहीं, बल्कि जीव-जंतुओं के प्रति भी करुणा का संदेश देता है। श्रद्धालु आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाते हैं और मंदिरों व छतों पर पक्षियों के लिए चुग्गा डालते हैं। बड़ी संख्या में भिक्षुकों के लिए भी यह मेला लक्ष्मीजी की कृपा का प्रतीक माना जाता है। up to date

रोशनी में नहाया बेणेश्वर धाम

साल भर शांत रहने वाला बेणेश्वर धाम मेले के दिनों में पूरी तरह जीवंत हो उठता है। लोकवाद्यों की गूंज, भजन-कीर्तन, मंदिरों की घंटियां और रात में रोशनी से जगमगाता टापू किसी दिव्य लोक जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है।

विदेशियों के लिए भी आकर्षण

हर वर्ष कई विदेशी पर्यटक भी बेणेश्वर महामेले को देखने आते हैं। एक ही दिन में लाखों श्रद्धालुओं का संगम स्नान, पितृ तर्पण और पारंपरिक अनुष्ठान उन्हें आश्चर्यचकित कर देते हैं। आदिवासी संस्कृति और लोकआस्था का यह अद्भुत संगम उन्हें लंबे समय तक याद रहता है। बेणेश्वर महामेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और लोकसंस्कृति का महापर्व है। यह मेला वागड़ अंचल की सांस्कृतिक आत्मा को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है और हर श्रद्धालु के मन में गहरी छाप छोड़ जाता है। up to date

साभार– डॉ. दीपक आचार्य

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