सोनीपत | क्राइम रिपोर्टर
सोनीपत के गांव बुटाना में वर्ष 2020 में गश्त पर निकले सिपाही और एसपीओ की चाकू मारकर हत्या के बहुचर्चित मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश नरेंद्र सिंह की अदालत ने दो युवतियों सहित चार दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। घटना के समय एक युवती नाबालिग थी। अदालत ने सभी दोषियों पर जुर्माना भी लगाया है।
यह सनसनीखेज वारदात 29-30 जून, 2020 की रात की है। सिपाही रविंद्र (30) निवासी गांव बुढ़ा खेड़ा, जिला जींद और एसपीओ कप्तान सिंह (42) निवासी गांव कलावती, जिला जींद बुटाना पुलिस चौकी में तैनात थे। दोनों 29 जून को एक ही बाइक पर चौकी पहुंचे थे और रात करीब 12 बजे गश्त के लिए निकले थे। अगले दिन 30 जून की सुबह दोनों के शव चौकी से करीब 600 मीटर दूर हरियाली सेंटर के पास पड़े मिले थे। दोनों की चाकू से गोदकर हत्या की गई थी।
जांच में सामने आया कि वारदात के समय जींद की अजमेर बस्ती का रहने वाला अमित, पानीपत के गांव पाथरी का नीरज, भिवानी के गांव घुसकानी का विकास और हिसार के गांव किनरनाडा का संदीप कार में बुटाना क्षेत्र में पहुंचे थे। उन्होंने पहले से तय योजना के तहत अपनी गर्लफ्रेंड आशा और एक नाबालिग लड़की को भी बुलाया था। आरोप है कि दोनों युवतियों ने घरवालों को नशीली गोलियां खिलाकर आधी रात को घर से बाहर निकलकर आरोपियों की कार में बैठ गई थीं।
इसी दौरान गश्त कर रहे दोनों पुलिसकर्मी वहां पहुंचे। कार में चार युवक और दो युवतियां आपत्तिजनक हालत में मिले। पुलिसकर्मियों द्वारा टोके जाने पर कहासुनी हो गई। विवाद इतना बढ़ा कि अमित और उसके साथियों ने चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दोनों पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी।
घटना के बाद पुलिस ने मोबाइल लोकेशन के आधार पर आरोपियों की पहचान की। करीब 17 घंटे बाद पुलिस टीम जब आरोपियों को पकड़ने पहुंची तो बदमाशों ने हमला कर दिया। मुठभेड़ में मुख्य आरोपी अमित पुलिस की गोली लगने से मारा गया, जबकि संदीप को मौके पर गिरफ्तार कर लिया गया। अन्य आरोपी नीरज, विकास, आशा और नाबालिग लड़की बाद में गिरफ्तार किए गए।
अदालत ने सुनवाई के बाद नीरज, संदीप, आशा और घटना के समय नाबालिग रही युवती को उम्रकैद की सजा सुनाई है।
घटना के बाद तत्कालीन एसपी जश्नदीप सिंह रंधावा, एडीजीपी, आईजी रोहतक रेंज और डीजीपी भी मौके पर पहुंचे थे। दोनों पुलिसकर्मियों को “बलिदानी” का दर्जा दिया गया था। कप्तान सिंह परिवार के इकलौते बेटे थे, जबकि रविंद्र अपने परिवार के अकेले कमाने वाले सदस्य थे। इस फैसले से परिजनों को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है।

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