यूट्यूब से सीखा खेल, बिना कोच के बना वर्ल्ड चैंपियनशिप ब्रॉन्ज मेडलिस्ट
सरसा के निहाल की संघर्ष, अनुशासन और लक्ष्य की प्रेरक सफलता कहानी
हर छोटे शहर में कुछ ऐसे युवा होते हैं जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने की हिम्मत रखते हैं। सिरसा के निहाल उन्हीं युवाओं में से एक हैं। आर्म रेसलिंग विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों तो रास्ते खुद बन जाते हैं। बिना किसी प्रोफेशनल कोच और सीमित सुविधाओं के बावजूद विश्व स्तर पर तीसरा स्थान हासिल करना कोई साधारण उपलब्धि नहीं है।
यह सिर्फ एक मेडल की कहानी नहीं है, बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन और निरंतर अभ्यास की कहानी है।
शुरुआत: यूट्यूब से सीखा आर्म रेसलिंग का गुर
निहाल ने बताया कि शुरुआत में उनके पास न तो कोई ट्रेनिंग सेंटर था और न ही कोई कोच। उन्होंने यूट्यूब पर आर्म रेसलिंग के वीडियो देखना शुरू किया। वीडियो के माध्यम से उन्होंने तकनीक (Technique), ग्रिप (Grip Strength), बॉडी बैलेंस और मैच स्ट्रैटेजी को समझा।
धीरे-धीरे यह रुचि जुनून में बदल गई। उन्होंने रोजाना अभ्यास को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया। सुबह वर्कआउट, दिन में पढ़ाई और शाम को फिर अभ्यास – यह उनका नियमित शेड्यूल बन गया।
बिना गाइडेंस के ट्रेनिंग करना आसान नहीं होता। गलत तकनीक से चोट लगने का खतरा रहता है। लेकिन निहाल ने रिसर्च, वीडियो एनालिसिस और खुद के अनुभव के आधार पर अपनी तकनीक में सुधार किया।
सीमित संसाधन, लेकिन असीम हौसला
सिरसा जैसे शहर में आर्म रेसलिंग के लिए विशेष इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध नहीं है। निहाल को अपने स्तर पर उपकरण जुटाने पड़े। उन्होंने लोकल जिम में उपलब्ध साधनों से अभ्यास किया।
उन्होंने अपनी ग्रिप स्ट्रेंथ बढ़ाने के लिए खास एक्सरसाइज की, जैसे:
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रिस्ट कर्ल (Wrist Curl)
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फोरआर्म ट्रेनिंग
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डेडलिफ्ट
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टेबल प्रैक्टिस
धीरे-धीरे उनकी ताकत और तकनीक दोनों मजबूत होती गईं। उन्होंने जिला और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लिया और बेहतर प्रदर्शन के दम पर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे।
विश्व चैंपियनशिप तक का सफर
लगातार मेहनत और बेहतरीन प्रदर्शन के बाद उनका चयन आर्म रेसलिंग विश्व चैंपियनशिप के लिए हुआ। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा मौका था।
विश्व स्तर पर प्रतियोगिता का स्तर बेहद ऊंचा होता है। अलग-अलग देशों के खिलाड़ी वर्षों से प्रोफेशनल ट्रेनिंग लेते हैं। ऐसे खिलाड़ियों के बीच मुकाबला करना चुनौतीपूर्ण था।
लेकिन निहाल ने दबाव को खुद पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने हर मैच में आत्मविश्वास के साथ प्रदर्शन किया। कड़े मुकाबलों के बाद उन्होंने तीसरा स्थान हासिल किया और भारत के लिए कांस्य पदक जीता।
जब पदक उनके गले में डाला गया, वह पल सिर्फ उनके लिए ही नहीं, बल्कि पूरे सरसा और देश के लिए गर्व का क्षण था।
पढ़ाई और खेल का संतुलन
निहाल वर्तमान में दिल्ली में बीटेक (CSE-AI) की पढ़ाई कर रहे हैं। इंजीनियरिंग जैसी कठिन पढ़ाई के साथ इंटरनेशनल लेवल की स्पोर्ट्स ट्रेनिंग को संतुलित करना आसान नहीं होता।
उन्होंने टाइम मैनेजमेंट को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया।
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सुबह फिटनेस ट्रेनिंग
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दिन में कॉलेज क्लास
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रात को स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और वीडियो एनालिसिस
उन्होंने साबित किया कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो तो पढ़ाई और खेल दोनों में सफलता हासिल की जा सकती है।
परिवार का अटूट समर्थन
निहाल अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता और परिवार को देते हैं।
पिता कुलविंद्र सिंह और माता रजनी ने हर कदम पर उनका साथ दिया। उनकी माँ रजनी ने भावुक होकर कहा कि यह कांस्य पदक भी उनके लिए स्वर्ण से कम नहीं है।
बहन डॉ. भव्या और मामा अनमोल चड्डा ने भी लगातार प्रेरणा दी। परिवार का यह समर्थन ही निहाल की सबसे बड़ी ताकत बना।
एक खिलाड़ी के लिए मानसिक मजबूती बहुत जरूरी होती है, और यह मजबूती परिवार के भरोसे से मिलती है।
समाज का सम्मान और सहयोग
निहाल की उपलब्धि पर शहर में खुशी की लहर दौड़ गई।
जयदेव-सहदेव जैन चैरिटेबल ट्रस्ट के प्रधान ललित जैन ने इसे पूरे सिरसा और देश के लिए गर्व का क्षण बताया और भविष्य में हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया।
लायंस क्लब सिरसा अमर के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी रमेश साहुवाला ने निहाल को गोल्ड मेडल और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। यह सम्मान न केवल उनकी उपलब्धि का सम्मान था, बल्कि आने वाले युवाओं के लिए प्रेरणा भी है।
मानसिक मजबूती और लक्ष्य
निहाल ने कहा कि इस बार वह तीसरे स्थान पर रहे हैं, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतना है।
उन्होंने साफ कहा कि कांस्य पदक उनके सफर की मंजिल नहीं, बल्कि शुरुआत है। उनका मानना है कि सफलता एक दिन में नहीं मिलती। इसके लिए निरंतर अभ्यास, सही रणनीति और आत्मविश्वास जरूरी है। उनकी यह सोच उन्हें भविष्य में और बड़ी उपलब्धियों तक ले जा सकती है।
युवाओं के लिए संदेश
निहाल की कहानी उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो संसाधनों की कमी को अपनी कमजोरी मान लेते हैं।
उन्होंने साबित किया कि:
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सीखने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म भी बड़ा माध्यम बन सकते हैं।
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बिना कोच के भी सही दिशा और अनुशासन से आगे बढ़ा जा सकता है।
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छोटे शहर का युवा भी विश्व स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकता है।
उनका संदेश साफ है –
“अगर आपके पास बड़ा सपना है, तो शुरुआत आज से करें। संसाधन बाद में जुड़ते जाते हैं, लेकिन मेहनत और लगन आपकी अपनी होती है।”
समर्पण और आत्मविश्वास की मिसाल
सिरसा के निहाल की सफलता कहानी संघर्ष, समर्पण और आत्मविश्वास की मिसाल है। यूट्यूब से सीखकर विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतना यह दर्शाता है कि आज के डिजिटल युग में ज्ञान की कोई सीमा नहीं है।
उन्होंने न केवल अपने परिवार का, बल्कि पूरे सिरसा और देश का नाम रोशन किया है। अब सभी की नजर उनकी अगली विश्व चैंपियनशिप पर है, जहां वह भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने का सपना लेकर उतरेंगे। निहाल की यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ी को यह विश्वास दिलाती है कि सपने छोटे शहरों में भी बड़े हो सकते हैं — बस उन्हें सच करने का साहस होना चाहिए।

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