Holi Special: बुरा ना मानो होली है: फागुन की वो मस्ती कहां गई? गांव के बुजुर्ग बोले – अब त्योहार में न प्यार रहा न यार

वक्त के साथ ही सब-कु छ बदल सा गया।up to date

बुजुर्ग बोले: त्यौहार तो म्हारे टेम मैं हौंवता, आज ना बे रंग रेया और न बे संग 

- समय के साथ फीके पड़ गए होली के रंग  

 एक वो समय था जब लोगों में त्यौहारों Holi Festival को लेकर कई-कई दिन पहले ही चाव चढ़ जाता था। उस वक्त लोगों में आपसी प्रेम-भाईचारा Bhaichara ऐसा था कि एक-दूसरे के सुख-दुख को लोग अपना समझते थे। लेकिन वक्त के साथ ही सब-कु छ बदल सा गया। यही कारण है कि आज त्यौहारों के मायने ही बदल गए हैं। कभी होली पर गांव की चौपाल में खूब गुलाल उड़ता था और लोगों की टोलियां घर-घर जाकर एक-दूसरे को गुलाल लगाती थी। up to date

इसके अलावा लोग घरों में तरह-तरह के पकवान Methai बनाते थे और एक -दूसरे के घरों में पहुंचाकर आपसी स्नेह Pyar को और बढ़ाते थे। लेकिन आज लोगों के पास न तो त्यौहार मनाने के लिए समय है और न ही किसी के सुख-दुख में शामिल होने का। 

न वो चौपाल Choupal के रंग रहे और न ही वो आपसी स्नेह एवं हंसी-ठिठोली। होली के त्यौहार पर जब गांव नुहियांवाली के कुछ बुजुर्गां से बात की गई तो उन्होंने कहा कि न वो रंग रहा और न संग। त्यौहार तो उनके समय हुआ करते थे। अब तो त्यौहारों के नाम पर औपचारिकता सी रह गई है।

 बुजुर्गां ने कहा कि न वो रंग रहा और न संग। up to date

 
होली के एक माह पहले ही चढ़ जाता था त्योहार का रंग 

पुराने समय की बातें करते हुए देवीलाल नेहरा ने बताया कि मेरी उम्र करीब 89 वर्ष की हो गई। त्यौहार तो हमारे समय में हुआ करते थे। हम जब होली का उत्सव मनाया करते थे तो बात ही कुछ और थी। घर में पकवान बनते थे। गांव के चौपाल में लोग एकत्र हो जाते। एक बड़ा कड़ाहा होता था जिसमें बहुत सारा रंग घोला जाता था। उसी रंग से फिर होली खेला करते थे। खूब गुलाल उड़ता था। हम घर-घर जाकर एक-दूसरे को रंग लगाते थे। up to date

 महिलाएं कोरड़े बरसाया करती थी। कोई किसी का गुस्सा नहीं करता था। जिस घर में लड़के का जन्म हुआ होता था उस घर से स्पेशल बधाई लेते थे। होली के एक माह पूर्व ही फाल्गुन माह की खुशी चढ़ जाती थी। अब तो सब-कुछ बदल गया। आज किसी के पास न तो समय है और न ही न वो आपसी स्नेह। अब तो भाई-भाई के मनों में भी फर्क आ गया है। काश वो समय फिर लौट आए। 

अब हो रही त्योहार के नाम पर औपचारिकता

चौपाल पर बैठे मनफूल ब्यावत लंबी सांस लेते हुए बोले, मेरी उम्र 86 वर्ष की हो गई। पहले के समय में जैसे ही फाल्गुन मास शुरू होता तो लोगों में खुशी छा जाती थी। गांव की चौपाल में खूब रंग खेलते थे। वो हंसी, वो ठिठोली और वो प्रेम अब कहां।up to date

 लकड़ी का प्रहलाद बनाते थे और होलिका दहन करते थे। उस समय मान्यता थी कि अगर किसी की शादी नहीं होती थी तो वो अगर जलती होली से लकड़ी रू पी प्रहलाद को निकाल लेगा तो उसकी शादी हो जाती थी। लोगों में बहुत प्रेम था। इसके अलावा होली पर युवकों की टोलियां घरों में जाकर भाभियों से खोपरे मांगती थी और गुलाल लगाती थीं। 

सुबह से लेकर शाम तक रंग खेलते थे। अब न वो टोलियां रहीं और न वो समय। अब त्यौहारों के नाम पर सिर्फ औपचारिकता व ज्यादातर हुल्लड़बाजी ही है।

लड़कियों को चाव होता था कि वे मायके जाएंगी। up to date

 

गांव में रात को गूंजते थे होली के गीत

घर पर मुड्ढे पर बैठी तुलसी देवी ने पुरानी यादों को ताजा करते हुए कहा, मेरी उम्र करीब 79 वर्ष की हो गई है। मैंने अपने जीवन में त्यौहार देखे ही नहीं अपितु हर्षोल्लास के साथ मनाए भी हैं। हमारे व आज के समय में जमीन-आसमान का फर्क आ गया है। उस वक्त लोगों में आपसी स्नेह बहुत था। होली से कई-कई दिन पूर्व ही विवाहिता लड़कियों को उनके ससुुराल से मायके ले आते थे। लड़कियों को चाव होता था कि वे मायके जाएंगी।

 घर के बाहर देर रात तक चबूतरे पर होली के गीत गूंजते थे। घरों में खूब पकवान बनते थे। एक-दूसरे के घरों में भी पकवान देने जाते थे। काश वो समय फिर लौट आए। आज लड़कियां त्यौहारों पर मायके आती तो हैं, लेकिन दिन नहीं बल्कि कुछ समय रुककर वापस चली जाती हैं। अब त्यौहारों को लेकर उत्साह कम है और औपचारिकता ज्यादा है। 

अब न वो रंग रहे न लगाने वाले

करीब 95 वर्षीय अनचाही देवी ने कहा कि त्यौहार हमारी संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है। पहले तो त्यौहारों का नाम सुनते ही चाव चढ़ जाता था। कई दिन पहले ही तैयारियां शुरू हो जाती थीं। मुझे याद है कि चौपाल में सुबह से ही लोग होली खेलने के लिए इकट्ठे हो जाते थे। बहुत हंसी-ठिठोली होती थी। कोई किसी का बुरा नहीं मानता था। 


लोगों के दिलों में किसी तरह का कोई खोट नहीं था। सुबह से लेकर सायं तक रंगोंं का दौर चलता था। लोग पूरा दिन रंगों में रंगे रहते थे। अब न वो रंग रहे और न वो पहले वाले लोग। अब समय में बहुत बदलाव आ गया है। आज किसी के पास समय है ही नहीं। 

#गांव_की_होली, #पुरानी_यादें,  #होली_स्पेशल,  #ग्रामीण_संस्कृति,  #फागुन_माह,  #होलिका_दहन,  #बुजुर्गों_की_बात,  #Indian_Festivals, #Holi2026, #UpToDate होली 2026, होलिका दहन परंपरा, गांव की संस्कृति, ग्रामीण भारत के त्यौहार, फागुन की मस्ती, होली के लोकगीत, होली और भाईचारा, भारतीय त्योहारों में बदलाव, गांव की होली, पुरानी होली की यादें, चौपाल की होली, ग्रामीण होली उत्सव, होली पर बुजुर्गों की राय, बदलती होली की परंपरा, फागुन का महीना, पारंपरिक होली Village Holi celebration, Traditional Holi memories, Holi in rural India, Old-fashioned Holi customs, Holi festival in villages, Changing Holi traditions, Fagun festival celebrations, Holi culture in India, Holi 2026, Holika Dahan tradition, Rural India festivals, Village community festivals, Holi songs and rituals, The spirit of Holi, Holi and brotherhood, Indian festival changes, #VillageHoli, #TraditionalHoli, #FagunFestival, #IndianCulture, #HolikaDahan, #OldHoli, #HoliMemories, #Holi2026, #IndianFestivals, #UpToDateHoli

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ