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| सात बेटियों का चयन भारतीय फुटबॉल टीमों में हुआ है up to date |
भिवानी। हरियाणा के भिवानी जिले का अलखपुरा गांव, जिसे आज “मिनी ब्राज़ील” के नाम से जाना जाता है, अब देश ही नहीं बल्कि विश्व पटल पर अपनी पहचान बना रहा है। इसकी वजह हैं गांव की वे बेटियां, जिन्होंने फुटबॉल के मैदान में मेहनत, अनुशासन और जज्बे से नया इतिहास रच दिया है। फिलहाल अलखपुरा गांव की सात बेटियों का चयन भारतीय फुटबॉल टीमों में हुआ है, जो गांव के लिए गर्व की बात है। up to date
इन सात बेटियों में एक का चयन सीनियर भारतीय टीम में हुआ है, जबकि पांच बेटियां अंडर-20 और एक बेटी अंडर-17 भारतीय टीम का हिस्सा बनी हैं। यह उपलब्धि न केवल गांव बल्कि पूरे जिले और प्रदेश के लिए प्रेरणा बन गई है।
पहचान बदली बेटियों ने
भिवानी जिले का गांव अलखपुरा कभी बॉलीवुड अभिनेत्री मल्लिका शेरावत और उनसे पहले आज़ादी से पहले के प्रसिद्ध दानवीर सेठ छाजूराम लांबा के नाम से जाना जाता था। लेकिन अब इस गांव की पहचान उसकी बेटियों से बन रही है। ये बेटियां फुटबॉल के दम पर देश और दुनिया में गांव का नाम रोशन कर रही हैं। up to date
गांव की खास बात यह है कि यहां लगभग हर बेटी फुटबॉल खेलती है। कई बेटियां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतकर सेना और रेलवे जैसी सेवाओं में नौकरी पा चुकी हैं। आज गांव की 30 से अधिक बेटियां सरकारी नौकरियों में कार्यरत हैं और आत्मनिर्भर बनकर अपने परिवार का सहारा बन रही हैं।
2005 से शुरू हुआ सफर
फुटबॉल कोच सोनिका बिजारनिया बताती हैं कि इस सफलता की शुरुआत साल 2005 के आसपास हुई थी। गांव के सरकारी स्कूल के पीटीआई गोवर्धन शर्मा ने पहले लड़कों को कबड्डी खिलाना शुरू किया। बाद में लड़कियां भी खेलने लगीं। जब लड़कों की परफॉर्मेंस अपेक्षा के अनुसार नहीं रही, तब उन्होंने लड़कियों को फुटबॉल सिखाने पर ध्यान दिया। up to date
जल्द ही लड़कियों ने जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक मेडल जीतने शुरू कर दिए। इसके बाद गांव की बेटियों ने 10 बार प्रतिष्ठित सुब्रतो कप में भाग लिया, जिससे उनका आत्मविश्वास और मजबूत हुआ।
सात बेटियां, भारतीय टीम में चयन
कोच सोनिका के अनुसार, फिलहाल गांव की सात बेटियों का चयन भारतीय टीमों में हुआ है।
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संजू यादव का चयन सीनियर भारतीय टीम में हुआ है। up to date
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पूजा जाखड़, मुसकान, पारुल, हिमांशु और रितु अंडर-20 टीम में शामिल हुई हैं।
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श्वेता का चयन अंडर-17 टीम में हुआ है।
ये सभी खिलाड़ी अलग-अलग राज्यों में चल रहे राष्ट्रीय कैंपों में हिस्सा ले रही हैं, जबकि संजू यादव सीनियर टीम के साथ तुर्की दौरे पर गई हुई हैं।
मेहनत से बदली किस्मत
इन बेटियों की कहानियां संघर्ष और आत्मनिर्भरता की मिसाल हैं। पूजा जाखड़ महज 18 साल की हैं और उनके पिता का निधन हो चुका है। इसके बावजूद उन्होंने फुटबॉल में मेडल और स्कॉलरशिप हासिल कर अपने पूरे परिवार का पालन-पोषण किया है। कोच सोनिका का कहना है कि ये बेटियां नाम भी कमा रही हैं और सम्मानजनक आजीविका भी। up to date
उन्होंने यह भी कहा कि यदि आधुनिक खेल उपकरण और बेहतर सुविधाएं मिलें, तो अलखपुरा की बेटियां भविष्य में और बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकती हैं।
200 से ज्यादा लड़कियां मैदान में
फुटबॉल खेल रही और हाल ही में सेना में चयनित पायल और अंजली बताती हैं कि गांव की 200 से ज्यादा लड़कियां नियमित रूप से फुटबॉल खेलती हैं। जैसे-जैसे पहले खिलाड़ियों ने मेडल जीते, वैसे-वैसे हर घर की बेटियों का रुझान खेल की ओर बढ़ता गया। up to date
उनका कहना है, “हमारा लक्ष्य गांव और देश का नाम रोशन करना है और अपने पैरों पर खड़ा होना है। फुटबॉल ने हमें यह हौसला दिया है।”
प्रेरणा बनता अलखपुरा
आज अलखपुरा गांव महिला सशक्तिकरण और खेल प्रतिभा का जीवंत उदाहरण बन चुका है। यहां की बेटियों ने यह साबित कर दिया है कि अगर अवसर, मार्गदर्शन और मेहनत मिल जाए, तो गांव की बेटियां भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का परचम लहरा सकती हैं। up to date

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