इस प्रकार करें गेहूँ से पीलापन दूर नहीं तो हो जाएगा खेत खाली




गेहूँ भारत की प्रमुख रबी फसल है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा, पोषण उपलब्धता तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आधारशिला मानी जाती है। उत्तर भारत के कृषि-प्रधान राज्यों - हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं बिहार—में गेहूँ की खेती व्यापक स्तर पर की जाती है, जहाँ यह फसल लाखों कृषक परिवारों की आय का मुख्य स्रोत है। गेहूँ उत्पादन प्रणाली में भूमि की तैयारी, उन्नत किस्मों का चयन, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, वैज्ञानिक सिंचाई, रोग-कीट नियंत्रण तथा श्रम लागत जैसे अनेक घटक सम्मिलित होते हैं। ऐसी स्थिति में फसल की वृद्धि के किसी भी चरण में उत्पन्न होने वाली जैविक, पोषणीय या पर्यावरणीय बाधा सीधे तौर पर उपज, दानों की गुणवत्ता और किसान की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करती है। गेहूँ की फसल में पीलापन, जिसे वैज्ञानिक रूप से क्लोरोसिस कहा जाता है, एक बहु-कारक आधारित समस्या है। इसे केवल एक दृश्य लक्षण के रूप में देखना वैज्ञानिक दृष्टि से अपर्याप्त है, क्योंकि यह पौधों की शारीरिक, जैव-रासायनिक एवं पोषण संबंधी प्रक्रियाओं में असंतुलन का स्पष्ट संकेत देता है। 

प्रारंभिक अवस्था में यह समस्या खेत के किसी सीमित भाग में दिखाई दे सकती है up to date


पीलापन इस बात का द्योतक है कि पौधों में क्लोरोफिल का संश्लेषण बाधित हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप प्रकाश संश्लेषण की दक्षता में कमी आती है। प्रारंभिक अवस्था में यह समस्या खेत के किसी सीमित भाग में दिखाई दे सकती है, किंतु यदि इसके कारणों की समय रहते पहचान और उचित प्रबंधन न किया जाए, तो यह संपूर्ण खेत में फैलकर उत्पादन क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।             

   सामान्यत: गेहूँ में पीलापन अंकुरण के पश्चात प्रारंभिक वृद्धि अवस्था से लेकर टिलरिंग तथा बढ़वार की मध्य अवस्था तक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस दौरान पौधों की पत्तियाँ अपना स्वाभाविक हरित रंग खोकर पीली अथवा पीले-सफेद रंग की हो जाती हैं। व्यवहारिक स्तर पर अनेक कृषक इसे मौसमीय प्रभाव, शीत तनाव या अस्थायी कमजोरी मानकर उपेक्षित कर देते हैं, जबकि वास्तविकता में यह मिट्टी की उर्वरता, पोषक तत्वों की उपलब्धता, सिंचाई प्रबंधन तथा रोग-कीट दबाव से संबंधित जटिल अंत:क्रियाओं का परिणाम होता है। विभिन्न शोध अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि यदि इस समस्या का वैज्ञानिक एवं समयबद्ध प्रबंधन न किया जाए, तो गेहूँ की उपज में 20 से 30 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।


इस समस्या का समयबद्ध प्रबंधन न किया जाए, तो गेहूँ की उपज में 20 से 30 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। up to date


गेहूँ में पीलापन उत्पन्न होने के प्रमुख कारण

 1. नाइट्रोजन की कमी

नाइट्रोजन गेहूँ की फसल का एक प्रमुख प्राथमिक पोषक तत्व है, जो पत्तियों के हरित रंग, शाकीय वृद्धि तथा टिलर निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाता है। नाइट्रोजन की कमी की स्थिति में सर्वप्रथम निचली एवं पुरानी पत्तियों में क्लोरोसिस दिखाई देता है, क्योंकि पौधा उपलब्ध नाइट्रोजन को नई पत्तियों की ओर स्थानांतरित कर देता है। दीर्घकालिक कमी के परिणामस्वरूप पौधे की समग्र वृद्धि प्रभावित होती है, टिलर संख्या घटती है तथा अंतत: बालियों की संख्या और दानों की भराव क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

2. जिंक की कमी

जिंक एक आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व है, जो एंजाइम सक्रियता, हार्मोन संश्लेषण एवं कोशिका विभाजन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जिंक की कमी होने पर नई पत्तियों पर पीली या सफेद धारियाँ दिखाई देने लगती हैं, पत्तियाँ संकरी एवं विकृत हो जाती हैं तथा पौधा बौना रह जाता है। यह समस्या विशेष रूप से क्षारीय, हल्की अथवा अधिक फॉस्फोरस युक्त मिट्टियों में अधिक पाई जाती है।


3. आयरन (लोहा) की कमी

आयरन की कमी मुख्यत: क्लोरोफिल संश्लेषण को प्रभावित करती है। इसकी कमी में ऊपरी, नई पत्तियाँ पीली हो जाती हैं जबकि उनकी शिराएँ हरी बनी रहती हैं, जिसे इंटरवेइनल क्लोरोसिस कहा जाता है। यह स्थिति सामान्यत: क्षारीय मिट्टी, अत्यधिक सिंचाई अथवा जलभराव की दशा में देखने को मिलती है।


 नमी की कमी पौधों की चयापचय क्रियाओं को प्रभावित कर देती है। up to date


4. असंतुलित सिंचाई प्रबंधन

सिंचाई व्यवस्था में असंतुलन—चाहे वह जल की कमी हो या अत्यधिक जलभराव—गेहूँ में पीलापन उत्पन्न करने का एक प्रमुख कारण है। जलभराव की स्थिति में जड़ों को पर्याप्त आॅक्सीजन नहीं मिल पाती, जिससे पोषक तत्वों का अवशोषण बाधित होता है। वहीं, नमी की कमी पौधों की चयापचय क्रियाओं को प्रभावित कर देती है।


5. शीत तनाव एवं पाला

अत्यधिक ठंड, शीत लहर अथवा पाले की स्थिति में पौधों की शारीरिक एवं जैव-रासायनिक क्रियाएँ धीमी हो जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप अस्थायी पीलापन दिखाई दे सकता है। यद्यपि तापमान सामान्य होने पर कई बार यह समस्या स्वत: कम हो जाती है, किंतु दीर्घकालिक शीत तनाव फसल को स्थायी क्षति पहुँचा सकता है।

6. रोग एवं कीट प्रकोप

पीला रतुआ, जड़ सड़न रोग तथा माहू जैसे रस-चूसक कीट गेहूँ में पीलापन उत्पन्न करने के प्रमुख जैविक कारक हैं। ये रोग एवं कीट पौधों की पोषण आपूर्ति तथा प्रकाश संश्लेषण क्षमता को बाधित कर उनकी वृद्धि एवं उत्पादकता को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं।

पहले एवं दूसरे पानी का वैज्ञानिक महत्व


यदि पहला पानी विलंब से दिया जाए, तो पीलापन बढ़ने की संभावना प्रबल हो जाती है। up to date



पहला पानी (20-25 दिन पश्चात)

बुवाई के 20-25 दिन बाद दिया जाने वाला प्रथम सिंचाई जल गेहूँ की फसल के लिए अत्यंत निर्णायक माना जाता है। इस अवस्था में जड़ प्रणाली का तीव्र विकास तथा टिलर निर्माण प्रारंभ होता है। प्रथम सिंचाई के साथ नाइट्रोजन की समुचित आपूर्ति पौधों की प्रारंभिक वृद्धि को सुदृढ़ करती है। यदि पहला पानी विलंब से दिया जाए, तो पीलापन बढ़ने की संभावना प्रबल हो जाती है।

दूसरा पानी (40-45 दिन पश्चात)

द्वितीय सिंचाई टिलरिंग अवस्था में दी जाती है, जब पौधों की जल एवं पोषक तत्वों की मांग अधिक होती है। इस चरण में नमी या पोषण की कमी टिलरों को कमजोर कर देती है, जिससे संभावित उपज में कमी आती है। समय पर दिया गया दूसरा पानी उत्पादक टिलरों की संख्या बढ़ाने में सहायक सिद्ध होता है।

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गेहूँ में पीलापन की रोकथाम एवं प्रबंधन रणनीतियाँ

1. संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन

  •  बुवाई के समय फॉस्फोरस युक्त उर्वरकों (डीएपी या एसएसपी) का संतुलित प्रयोग करें।
  • नाइट्रोजन की अनुशंसित मात्रा को 2-3 चरणों में विभाजित कर दें।
  • जिंक की कमी वाले क्षेत्रों में 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर मिट्टी में मिलाएँ।
  • उर्वरक प्रयोग से पूर्व मिट्टी परीक्षण को प्राथमिकता देना दीर्घकालिक रूप से लाभकारी सिद्ध होता है।


2. पर्णीय (फोलियर) पोषण

  •  पीलापन के लक्षण दिखाई देने पर 2 प्रतिशत यूरिया घोल का पर्णीय छिड़काव करें।
  • जिंक की कमी की स्थिति में 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट + 0.25 प्रतिशत बुझा चुना मिलाकर छिड़काव करें।
  • आवश्यकता के अनुसार 10-15 दिन के अंतराल पर पुन: छिड़काव किया जा सकता है।


3. सिंचाई एवं जल निकास प्रबंधन

  • खेत में जलभराव से बचाव हेतु प्रभावी जल निकास व्यवस्था सुनिश्चित करें।
  • मिट्टी की बनावट, फसल की अवस्था और मौसम की परिस्थितियों के अनुरूप सिंचाई करें।
  • पाले की आशंका होने पर हल्की सिंचाई फसल सुरक्षा में सहायक होती है।

4. रोग एवं कीट प्रबंधन

  • पीला रतुआ नियंत्रण के लिए अनुशंसित फफूंदनाशकों, जैसे प्रोपिकोनाजोल या टेबुकोनाजोल, का प्रयोग करें।
  • माहू एवं अन्य कीटों के नियंत्रण हेतु नीम आधारित अथवा प्रमाणित कीटनाशकों का उपयोग करें।
  • कृषकों एवं कृषि पेशेवरों के लिए प्रमुख अनुशंसाएँ
  • नियमित अंतराल पर मिट्टी एवं पौध ऊतक परीक्षण कराएँ।
  • केवल नाइट्रोजन पर निर्भर न रहकर समेकित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाएँ।
  • फसल की वृद्धि अवस्था के अनुरूप सिंचाई एवं उर्वरक प्रबंधन सुनिश्चित करें।
  • खेत का सतत निरीक्षण कर प्रारंभिक लक्षणों पर त्वरित हस्तक्षेप करें।
  • जटिल परिस्थितियों में कृषि वैज्ञानिकों, कृषि विश्वविद्यालयों अथवा कृषि विस्तार सेवाओं से परामर्श लें।

नाइट्रोजन पर निर्भर न रहकर समेकित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाएँ। up to date



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