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हनुमानगढ़। भादरा क्षेत्र से जुड़े ‘किसान भवन’ जमीन आवंटन मामले ने अब गंभीर कानूनी और राजनीतिक रूप ले लिया है। राजस्थान की राजनीति में सक्रिय रहे भादरा के पूर्व विधायक बलवान पूनिया एक बार फिर सुर्खियों में हैं। उनके ड्रीम प्रोजेक्ट कहे जाने वाले ‘किसान भवन’ की जमीन को लेकर दायर याचिका पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार से स्पष्ट जवाब तलब किया है।up to date
यह मामला अब केवल जमीन आवंटन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी नियमों, सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग और राजनीतिक प्रभाव के दुरुपयोग जैसे सवालों को भी जन्म दे रहा है। up to date
क्या है पूरा विवाद
विवाद की जड़ भादरा स्थित उस भूमि से जुड़ी है, जिसे एक निजी समिति को रियायती दरों पर आवंटित किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई है कि यदि ‘किसान भवन’ एक सार्वजनिक उपयोग की सुविधा है, तो फिर उसका स्वामित्व और संचालन किसी सरकारी संस्था के बजाय निजी समिति को क्यों सौंपा गया।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या इस आवंटन में सरकारी नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया गया, या फिर राजनीतिक रसूख के आधार पर विशेष रियायत दी गई। up to date
अदालत का सख्त रुख
मामले की हालिया सुनवाई के दौरान प्रतिवादी संख्या 4 (निजी समिति) के अधिवक्ता मंजीत गोदारा ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। इस पर न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए अगली सुनवाई फरवरी 2026 के प्रथम सप्ताह में तय की। up to date
माननीय उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के अधिवक्ता को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि अगली सुनवाई में यह बताया जाए कि किन नियमों और प्रावधानों के तहत किसी निजी समिति को सार्वजनिक सुविधा के नाम पर रियायती दर पर जमीन आवंटित की गई।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज
पूर्व विधायक बलवान पूनिया हाल के दिनों में हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री के विरोध और किसानों पर लाठीचार्ज जैसे मुद्दों को लेकर सड़कों पर आंदोलन करते नजर आए हैं। ऐसे में यह मामला राजनीतिक रंग भी पकड़ चुका है।
विरोधी खेमे का आरोप है कि पूनिया के विधायक कार्यकाल के दौरान सत्ता के प्रभाव का इस्तेमाल कर नियमों को दरकिनार किया गया। वहीं, उनके समर्थक इसे किसानों के हित में उठाया गया कदम बताते हुए पूरी प्रक्रिया को वैध ठहरा रहे हैं। up to date
आगे क्या हो सकता है
अगली सुनवाई में राज्य सरकार का जवाब इस मामले की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। यदि सरकार अदालत को यह संतोषजनक रूप से स्पष्ट नहीं कर पाती कि निजी समिति को जमीन आवंटन किन वैधानिक नियमों के तहत किया गया, तो ‘किसान भवन’ के संचालन और स्वामित्व पर सवाल और गहरे हो सकते हैं।
ऐसी स्थिति में यह भी संभव माना जा रहा है कि भवन को लेकर सरकारी नियंत्रण या अन्य वैधानिक प्रक्रियाएं सामने आ सकती हैं। वहीं, यदि आवंटन प्रक्रिया में अनियमितताएं पाई जाती हैं, तो यह पूर्व विधायक बलवान पूनिया के लिए राजनीतिक रूप से बड़ा झटका साबित हो सकता है।
क्षेत्रीय राजनीति पर असर तय
भादरा और हनुमानगढ़ की राजनीति पर इस प्रकरण का प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है। किसान हितों से जुड़े नाम और जमीन आवंटन के सवालों के कारण यह मामला आने वाले समय में चुनावी चर्चाओं का भी अहम मुद्दा बन सकता है।
फिलहाल सभी की निगाहें फरवरी 2026 में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सरकार का जवाब इस पूरे विवाद की आगे की तस्वीर साफ कर सकता है।

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